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पोषण ट्रैकर: क्या डिजिटल डेटा वास्तव में बच्चों की थाली में बदलाव ला पा रहा है?

भारत के ग्रामीण अंचलों में, जहाँ सूरज की पहली किरणें आंगनवाड़ी केंद्रों की दीवारों को छूती हैं, वहाँ एक मौन क्रांति चल रही है। यह क्रांति कागजों के ढेर और स्याही के धब्बों से शुरू होकर अब स्मार्टफोन की स्क्रीन और डिजिटल डेटा में बदल गई है। ‘पोषण ट्रैकर’ (Poshan Tracker) — यह केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं है, बल्कि यह भारत की स्वास्थ्य प्रणाली के डिजिटलीकरण का एक महत्वाकांक्षी प्रतीक है। लेकिन इस डिजिटल चमक के पीछे एक गहरा और जटिल प्रश्न छिपा है: क्या यह डेटा वास्तव में उन बच्चों के जीवन को बेहतर बना रहा है, जिनके लिए यह बनाया गया है?
कागज से पिक्सल तक: एक ऐतिहासिक बदलाव
वर्षों तक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की दुनिया कागजी रजिस्टरों, भारी-भरकम फाइलों और हाथ से लिखी गई रिपोर्टों तक सीमित थी। जानकारी का प्रवाह धीमा था, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह अक्सर समय के साथ तालमेल नहीं रख पाता था। एक बच्चे के कुपोषण के लक्षण को पहचानने और उस पर कार्रवाई करने में जो समय लगता था, वह जीवन बचाने के लिए बहुत अधिक था।
विश्व बैंक के अनुसार, पोषण ट्रैकर का आगमन एक ‘रूपांतरकारी बदलाव’ (transformative shift) है। इसने सूचना के प्रवाह को वास्तविक समय (real-time) में बदल दिया है। अब, एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने फोन के माध्यम से दर्ज कर सकती है कि किस बच्चे ने आज भोजन किया, किसका वजन कितना है और किसे अनुपूरक आहार (complementary food) की आवश्यकता है। यह पारदर्शिता का एक नया युग है, जिसे हम ‘डिजिटल दृश्यता’ (Digital Visibility) कह सकते हैं।
डेटा की चमक और ज़मीनी हकीकत: NFHS 6 का सबक
लेकिन, सांख्यिकी और वास्तविकता के बीच हमेशा एक खाई होती है। हालिया राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS 6) के आंकड़े एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जो आशा और चिंता दोनों को एक साथ समेटे हुए है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में स्टंटिंग (नाटापन) 35.5% से घटकर 29.3% पर आ गई है, और गंभीर तीव्र कुपोषण (severe acute wasting) 7.7% से गिरकर 5.2% पर पहुंच गया है। ये आंकड़े एक बड़ी सफलता की तरह दिखते हैं।
हालांकि, यदि हम गहराई से देखें, तो एक चिंताजनक तथ्य अभी भी बना हुआ है: 6 से 8 महीने की आयु के 40.5% बच्चों को अभी भी वह अनुपूरक आहार नहीं मिल पा रहा है जो उनके विकास के लिए आवश्यक है। यहाँ हम उस ‘दिखावे’ की सीमा पर पहुँच जाते हैं। डिजिटल ट्रैकर यह तो बता सकता है कि एक कार्यक्रम चलाया गया है, लेकिन यह नहीं बता सकता कि उस बच्चे के घर में उस पोषण का वास्तविक लाभ पहुँचा या नहीं।
जवाबदेही बनाम सशक्तिकरण: कार्यकर्ता का बोझ
यहाँ एक महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न उभरता है: डिजिटल तकनीक का बोझ किसके कंधों पर है? आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, जो पहले से ही समाज के सबसे निचले स्तर पर काम करने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है, अब डेटा प्रविष्टि (data entry) के एक नए बोझ तले दबी है।
डिजिटल रिपोर्टिंग का एक अनचाहा प्रभाव यह हुआ है कि कार्यकर्ता के कीमती समय का एक बड़ा हिस्सा अब ‘देखभाल’ (care) से हटकर ‘डेटा’ (data) की ओर मुड़ गया है। एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का असली काम बच्चों के साथ बातचीत करना, उन्हें पोषण के बारे में शिक्षित करना और माताओं के साथ परामर्श (counselling) करना है। लेकिन जब डेटा का संग्रह इतना जटिल और समय लेने वाला हो जाता है, तो ‘देखभाल’ और ‘डेटा’ के बीच एक संघर्ष शुरू हो जाता है। क्या हम आंगनवाड़ी को एक स्वास्थ्य केंद्र से बदलकर एक डेटा संग्रह केंद्र बना रहे हैं?
डिजिटल धर्म: सत्य, सेवा और न्याय का लेंस
जब हम ‘डिजिटल धर्म’ (Digital Dharma) के सिद्धांतों के माध्यम से इस व्यवस्था को देखते हैं, तो चित्र और भी स्पष्ट हो जाता है।
सत्य (Satya): क्या डेटा वास्तव में वास्तविक स्थिति को दर्शाता है? या यह केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता है जिसे पूरा करने के लिए डेटा को ‘सुधार’ दिया जाता है ताकि रिपोर्ट अच्छी दिखे? डिजिटल दृश्यता (Visibility) सत्य हो सकती है, लेकिन वह पूर्ण सत्य नहीं है जब तक कि वह बच्चे के स्वास्थ्य के वास्तविक सुधार से न जुड़े।
सेवा (Seva): सेवा का अर्थ है निस्वार्थ भाव से दूसरों का कल्याण करना। यदि तकनीक का उपयोग केवल निगरानी (monitoring) के लिए किया जा रहा है, तो वह सेवा के मूल उद्देश्य से भटक रही है। तकनीक का उद्देश्य कार्यकर्ता को ‘जवाबदेह’ बनाना नहीं, बल्कि उसे ‘सशक्त’ बनाना होना चाहिए।
न्याय (Nyaya): क्या यह डिजिटल परिवर्तन न्यायपूर्ण है? यदि डेटा का उपयोग केवल कमियों को खोजने और दंडित करने के लिए किया जाता है, तो यह अन्याय है। न्याय तब होता है जब डेटा का उपयोग उन संसाधनों और सहायता को उन क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए किया जाए जहाँ उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
निष्कर्ष: डेटा से पोषण तक का सफर
पोषण ट्रैकर एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन यह अपने आप में कोई समाधान नहीं है। यह केवल एक साधन है। हमें एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता है जहाँ डेटा केवल एक रिपोर्ट न रहे, बल्कि वह क्रिया (action) का आधार बने। हमें रिपोर्टिंग के बोझ को कम करने और पोषण संबंधी परामर्श (nutrition counselling) के समय को बढ़ाने के लिए तकनीक को और अधिक सहज और उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाना होगा।
अंततः, सफलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि हमारे पास कितना डेटा है, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि उस डेटा ने कितने बच्चों को कुपोषण के चक्र से बाहर निकाला है। क्या हम डिजिटल पारदर्शिता को वास्तविक पोषण संबंधी परिणामों में बदलने के लिए तैयार हैं? समय और आने वाली पीढ़ियाँ इसका उत्तर देंगी।
क्या हम तकनीक को केवल देखने के लिए बना रहे हैं, या वास्तव में पोषण देने के लिए?
स्रोत:
रोहिणी सरन (Rohini Saran), “Beyond Delivery: Reimagining Anganwadis for Better Nutrition Outcomes”, ORF, 2026-10-03 — https://www.orfonline.org/expert-speak/beyond-delivery-reimagining-anganwadis-for-better-nutrition-outcomes (NFHS 6 के आंकड़े और विश्व बैंक का कथन इसी लेख के हवाले से)