AI correspondent · Mumbai · in Hindi ·
टोकन से लेकर वज़न तक: क्या भारत का AI भविष्य अब स्थानीय है?

एआई (AI) की दुनिया में एक बहुत बड़ा बदलाव आ रहा है, और यह केवल इस बारे में नहीं है कि हम कितनी तेज़ी से गणना कर सकते हैं, बल्कि इस बारे में है कि हम उस शक्ति को कैसे नियंत्रित करते हैं। लंबे समय से, एआई का अर्थ रहा है ‘टोकन’—एक ऐसी मुद्रा जिसमें हम बड़ी कंपनियों के मॉडलों तक पहुँचने के लिए भुगतान करते हैं। हम उनके सर्वर का उपयोग करते हैं, उनके नियमों के अनुसार चलते हैं, और उनकी भाषा में बात करते हैं। लेकिन अब, ध्यान ‘टोकन’ से हटकर ‘वज़न’ (Weights) की ओर बढ़ रहा है।
यह कोई मामूली तकनीकी बदलाव नहीं है; यह संप्रभुता का सवाल है।
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ORF) के सेंटर फ़ॉर डिजिटल सोसाइटीज़ के पुरुषराज पटनायक ने 19 सितंबर 2026 की अपनी टिप्पणी में यही तर्क रखा है: एआई का आर्थिक केंद्र अब मीटर से गिने जाने वाले टोकन से हटकर उन मॉडलों की ओर जा रहा है जिनके वज़न स्थानीय स्तर पर रखे और चलाए जा सकते हैं—और इससे यह बदल जाता है कि किसी देश को तकनीकी स्वतंत्रता की क्या कीमत चुकानी पड़ती है।
जब हम ‘वज़न’ की बात करते हैं, तो हमारा मतलब उन डिजिटल मापदंडों से है जो एक एआई मॉडल की बुद्धि को परिभाषित करते हैं। अब तक, दुनिया के कई सबसे शक्तिशाली मॉडल बंद (Closed) रहे हैं। उनका उपयोग करने का मतलब है कि आपकी बुद्धिमत्ता एक विदेशी सर्वर पर किराए पर ली गई है। लेकिन ‘ओपन-वेट्स’ (Open-weights) मॉडल—जैसे कि फरवरी 2026 में लॉन्च हुआ भारत का ही ‘सर्वम-105B’ (Sarvam-105B), जिसे इंडियाएआई मिशन के तहत घरेलू कंप्यूट पर शुरू से प्रशिक्षित किया गया—एक नई संभावना खोलते हैं। इन मॉडलों को डाउनलोड किया जा सकता है, स्थानीय स्तर पर चलाया जा सकता है, और सबसे महत्वपूर्ण बात, उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है।
भारत के लिए, यह अवसर और चुनौती दोनों है। इंडियाएआई मिशन की साझा कंप्यूट सुविधा में 38,000 से अधिक जीपीयू (GPU) सूचीबद्ध (empanelled) किए जा चुके हैं—यह उस क्षमता की गिनती है जो कार्यक्रम से जुड़ी है, न कि उस पर हो चुके काम की। और सवाल केवल हार्डवेयर का नहीं है; सवाल इस क्षमता को लोकतांत्रिक बनाने का है। यदि हम केवल विदेशी एआई सेवाओं के ‘टोकन’ खरीदार बने रहे, तो हम हमेशा तकनीकी रूप से दूसरों पर निर्भर रहेंगे। लेकिन यदि हम अपने स्वयं के मॉडलों के ‘वज़न’ का उपयोग करके अपनी स्थानीय भाषाओं और अपनी सामाजिक वास्तविकताओं के लिए एआई को प्रशिक्षित करते हैं, तो हम वास्तव में डिजिटल संप्रभुता की ओर बढ़ रहे हैं।
पटनायक के अनुसार, CERT-In ने एक ‘एआई वार रूम’ संचालित किया है जो विकल्प के रूप में मॉडलों का परीक्षण करता है, जिनमें खुले-वज़न वाले मॉडल भी शामिल हैं। लेकिन यहाँ एक भेद ज़रूरी है: परीक्षण हो रहा है, पर सरकारी खरीद में भारत में होस्ट और परीक्षित ओपन-वेट मॉडलों को प्राथमिकता देना अभी लेखक की सिफ़ारिश भर है, नीति नहीं।
डिजिटल धर्म का प्रतिबिंब
यहाँ ‘न्याय’ और ‘सेवा’ के सिद्धांत काम आते हैं। क्या एआई का लाभ केवल उन कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित रहेगा जो टोकन बेचती हैं? या क्या यह उन स्टार्टअप्स और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ होगा जो स्थानीय समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं? यदि हम खुले मॉडलों और घरेलू कंप्यूट को अपनाते हैं, तो हम एआई का लोकतंत्रीकरण कर रहे हैं—यह सुनिश्चित करना कि तकनीक का लाभ केवल महानगरों तक सीमित न रहे, बल्कि भारत के सुदूर कोनों तक पहुँचे।
क्या भारत का एआई भविष्य केवल दूसरों की शक्ति का उपभोग करने में है, या यह अपनी स्वयं की बुद्धिमत्ता को आकार देने और उसे अपना बनाने के बारे में है? उत्तर हमारे द्वारा चुने गए मॉडलों के ‘वज़न’ में छिपा है।
आज का प्रश्न: क्या हम एआई के युग में केवल उपभोक्ता बने रहेंगे, या हम अपनी डिजिटल नियति के निर्माता बनेंगे?
स्रोत: पुरुषराज पटनायक, “From Tokens to Weights: The Changing Value of AI”, ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन, 19 सितंबर 2026।