दिल्ली के डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र में नालंदा हॉल की दीवारें आज एक ऐतिहासिक संवाद की गवाह बनीं। यहाँ भाषा विशेषज्ञ, शिक्षाविद, नागरिक समाज संगठन और डेटा प्रैक्टिशनर एक साथ बैठे थे — न किसी तकनीकी सम्मेलन के औपचारिक माहौल में, बल्कि एक ऐसी कार्यशाला में जहाँ भारत की 1.4 अरब आवाज़ों को डिजिटल दुनिया में जगह दिलाने का सपना साकार होने की शुरुआत हो रही थी। भाषिनी समुदाय (BHASHINI Samudaye) का यह आयोजन सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था — यह भारत की भाषाई संप्रभुता की दिशा में एक निर्णायक कदम था।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अंतर्गत डिजिटल इंडिया भाषिनी डिवीजन (DIBD) ने 13 जनवरी 2026 को इस कार्यशाला का आयोजन किया। यह भाषिनी के नेतृत्व में एक सहयोगात्मक पहल है जो राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन (NLTM) के तहत कार्य करती है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है — भाषा की बाधाओं को समाप्त करना और सभी भारतीय भाषाओं में डिजिटल सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करना। लेकिन इस बार कुछ अलग था। पहली बार, सरकार ने स्वीकार किया कि भाषाई AI का निर्माण केवल तकनीकी विशेषज्ञों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता — इसमें उन समुदायों की भागीदारी अनिवार्य है जो इन भाषाओं को जीते हैं, बोलते हैं और सांस लेते हैं।
कार्यशाला में कई महत्वपूर्ण सत्र हुए। डिजिटल इंडिया भाषिनी डिवीजन के CEO श्री अमिताभ नाग ने एक “फायरसाइड चैट” में भाषिनी के विकास की यात्रा पर प्रकाश डाला। गेट्स फाउंडेशन के AI विभाग के वरिष्ठ अधिकारी श्री अर्जुन वेंकटरमन ने इस सत्र का संचालन किया। यह संयोजन अपने आप में एक संदेश था — भारत का भाषाई AI न केवल राष्ट्रीय प्राथमिकता है, बल्कि वैश्विक संगठन भी इसके प्रभाव को समझ रहे हैं। JNU के संस्कृत और भारतीय अध्ययन विभाग के प्रोफेसर गिरीश नाथ झा, रॉकेट लर्निंग की सुखना सावनी, कर्या के CEO मनु चोपड़ा और सिविकडेटालैब की नुपुरा गावडे जैसे विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञों की उपस्थिति ने दर्शाया कि भाषाई AI शिक्षा, गवर्नेंस और सामाजिक सशक्तिकरण के हर पहलू को छूता है।
भाषिनी समुदाय प्लेटफॉर्म पर एक विशेष सत्र ने साझेदारों से संरचित प्रस्तुतियाँ और फीडबैक प्राप्त किया। यह “भाषादान” (BhashaDaan) का लाइव प्रदर्शन था — भाषिनी का वह नागरिक योगदान प्लेटफॉर्म जहाँ आम भारतीय अपनी भाषा में डेटा योगदान कर सकते हैं। कल्पना कीजिए — एक झारखंड की संथाली बोलने वाली आदिवासी महिला अपने स्मार्टफोन से कुछ वाक्य बोलती है, और वे वाक्य एक विशाल AI मॉडल को प्रशिक्षित करने में मदद करते हैं। यह केवल तकनीकी प्रगति नहीं है — यह लोकतांत्रिक भागीदारी का एक नया अध्याय है।
लेकिन इस उत्साह के बीच कुछ कठोर प्रश्न भी उठते हैं। भारत में 22 आधिकारिक भाषाएँ हैं और 19,500 से अधिक बोलियाँ। क्या भाषिनी वास्तव में इस विविधता को समाहित कर पाएगी? या यह हिंदी-अंग्रेजी केंद्रित रहकर बाकी भाषाओं को हाशिए पर छोड़ देगी? कार्यशाला में “डेटा सिस्टम को मजबूत करने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI)” पर एक सत्र हुआ, जिसमें नैतिक, समावेशी और स्केलेबल डेटा निर्माण के मानकों पर चर्चा हुई। यह स्वीकारोक्ति थी कि अभी तक का डेटा संग्रहण असमान रहा है — शहरी, शिक्षित और हिंदी-भाषी आबादी का प्रतिनिधित्व अधिक है, जबकि ग्रामीण और आदिवासी समुदायों की आवाज़ें कम सुनी गई हैं।
डिजिटल धर्म के नज़रिए से देखें तो भाषिनी समुदाय सेवा (Seva) और न्याय (Nyaya) के सिद्धांतों की एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। सेवा का अर्थ है कि AI को सभी की सेवा करनी चाहिए, न कि केवल उन लोगों की जो अंग्रेजी बोलते हैं या मेट्रो शहरों में रहते हैं। एक बिहार के किसान को जब फसल बीमा की जानकारी चाहिए, तो उसे भोजपुरी में मिलनी चाहिए। एक केरल की मछुआरन को मौसम की चेतावनी मलयालम में समझ में आनी चाहिए। न्याय का प्रश्न और भी गहरा है — क्या वे समुदाय जो अपना डेटा दे रहे हैं, उन्हें इस डेटा के उपयोग में बराबर का अधिकार मिलेगा? या वे केवल “डेटा स्रोत” बनकर रह जाएंगे, जबकि लाभ कहीं और जाएगा?
सत्य (Satya) का पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भाषिनी के दावे बड़े हैं — “समन्वित, संप्रभु और समावेशी भाषाई AI पारिस्थितिकी तंत्र”। लेकिन जमीनी हकीकत क्या है? अभी भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है। जहाँ है, वहाँ स्मार्टफोन की पहुँच सीमित है। जहाँ स्मार्टफोन है, वहाँ डिजिटल साक्षरता का अभाव है। भाषिनी को इन बुनियादी चुनौतियों से जूझना होगा। यह केवल एक AI प्लेटफॉर्म बनाने का मामला नहीं है — यह भारत की डिजिटल खाई को पाटने का प्रश्न है।
कार्यशाला में एक उम्मीद की किरण भी थी। भाषिनी का “एक्शन में भाषिनी” प्रदर्शन दिखाया गया — वास्तविक उपयोग के मामले जहाँ AI-संचालित अनुवाद ने सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुँचाई। शिक्षा में बहुभाषी AI का उपयोग, सार्वजनिक सेवा वितरण में भाषा की बाधा को हटाना — ये सब आशाजनक संकेत हैं। लेकिन असली सफलता तब मिलेगी जब मणिपुर की मैतेई बोलने वाली दादी भी अपने फोन पर सरकारी सेवाओं को उतनी ही आसानी से एक्सेस कर पाए जितनी आसानी से दिल्ली का एक MBA ग्रेजुएट करता है।
भाषिनी समुदाय का यह आयोजन एक शुरुआत है, अंत नहीं। सरकार ने पहली बार खुले तौर पर माना है कि भाषाई AI का निर्माण एक सामूहिक प्रयास होना चाहिए। यह “सह-निर्माण, शासन और स्केलिंग” का वादा है। लेकिन वादे कागज़ पर आसान होते हैं, जमीन पर कठिन। अगले कुछ वर्षों में हमें देखना होगा कि क्या भाषिनी वास्तव में भारत की भाषाई विविधता को अपने AI मॉडलों में समाहित कर पाती है, या यह एक और सरकारी पहल बनकर रह जाती है जो शहरी भारत तक सीमित रहती है।
क्या भारत की 19,500 बोलियाँ कभी डिजिटल दुनिया में अपनी जगह पा सकेंगी? या AI का युग भी उन्हीं भाषाओं का होगा जो पहले से ताकतवर हैं? यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं है — यह भारत की आत्मा का प्रश्न है। भाषिनी समुदाय ने इस प्रश्न को सामने रखा है। उत्तर हम सबको मिलकर खोजना होगा।
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