बजट 2026: भारत की AI महत्वाकांक्षाओं की नींव — डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर पर दांव
मुंबई के एक वातानुकूलित कार्यालय में बैठे अंकित सरैया अपने लैपटॉप पर भारत का नक्शा देख रहे हैं। इस नक्शे पर लाल बिंदु उन स्थानों को दर्शाते हैं जहाँ आने वाले वर्षों में विशाल डेटा सेंटर खड़े होंगे — हैदराबाद, चेन्नई, विशाखापट्टनम, और कई अन्य शहर। ये सिर्फ इमारतें नहीं हैं; ये भारत के डिजिटल भविष्य की नींव हैं। टेक्नो डिजिटल के निदेशक और सीईओ सरैया कहते हैं कि भारत का डेटा सेंटर और AI इकोसिस्टम अब पूंजी की कमी से नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की चुनौतियों से जूझ रहा है। और यहीं पर बजट 2026 की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के वैश्विक केंद्र के रूप में भारत की महत्वाकांक्षाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। इस दौड़ में एक बड़ी बाधा स्पष्ट रूप से उभरी है: डेटा सेंटर। जो कभी IT की पृष्ठभूमि का हिस्सा माने जाते थे, वे अब भारत की AI रणनीति के केंद्र में हैं। वैश्विक टेक दिग्गज भारत में भारी निवेश कर रहे हैं — माइक्रोसॉफ्ट ने अगले चार वर्षों में 17.5 बिलियन डॉलर, अमेज़ॅन ने पांच वर्षों में 35 बिलियन डॉलर, और गूगल ने अदानी ग्रुप और भारती एयरटेल के साथ साझेदारी में 15 बिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। रिपोर्टों के अनुसार, मेटा भी सिफी के साथ विशाखापट्टनम के पास 500MW की सुविधा विकसित कर रही है। कुल मिलाकर, यह लगभग 67.5 बिलियन डॉलर का निवेश है — भारत ने किसी एक क्षेत्र में इतना बड़ा निवेश शायद ही पहले देखा हो।
लेकिन पूंजी की उपलब्धता और मांग के बावजूद, असली चुनौती क्रियान्वयन में है। बिजली की उपलब्धता सबसे बड़ी समस्या है। AI-संचालित कार्यभार — विशेष रूप से GPU-आधारित कंप्यूटिंग — पारंपरिक क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की तुलना में पांच से छह गुना अधिक बिजली खपत करते हैं। एक AI रैक की बिजली खपत पूरे गाँव की बिजली जरूरतों से अधिक हो सकती है। डेल टेक्नोलॉजीज इंडिया के वेंकट सीताराम कहते हैं कि भारत को नियामकीय गति, पूर्वानुमेय अनुमोदन और दीर्घकालिक इंफ्रास्ट्रक्चर रोडमैप की आवश्यकता है। पब्लिसिस सेपिएंट इंडिया के संजय मेनन इससे भी आगे जाकर कहते हैं कि सरकार को सबसे पहले बिजली आपूर्ति की पर्याप्तता और पूर्वानुमेयता को प्राथमिकता देनी चाहिए — विश्वसनीय और पर्याप्त बिजली के बिना, कोई भी कंपनी डेटा सेंटर या अन्य महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश नहीं करेगी।
स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) अब केवल एक चेकबॉक्स नहीं रही; यह संचालन का लाइसेंस बन गई है। हाइपरस्केलर और वैश्विक उद्यम तेजी से कम-कार्बन, ऊर्जा-कुशल और जल-जिम्मेदार इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग कर रहे हैं। उद्योग जगत बजट 2026 से कई अपेक्षाएँ रखता है: सत्यापन योग्य पावर यूसेज इफेक्टिवनेस (PUE) बेंचमार्क से जुड़ी त्वरित मूल्यह्रास और कर प्रोत्साहन, लिक्विड कूलिंग और वेस्ट-हीट रिकवरी पायलट के लिए अनुदान, नवीकरणीय-भारी परियोजनाओं के लिए ब्याज सब्सिडी, और चौबीसों घंटे स्वच्छ बिजली सक्षम करने के लिए बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों का समर्थन। KPMG के अनुमान के अनुसार, भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2030 तक पांच गुना बढ़कर 8 GW से अधिक हो सकती है, जिससे 30 बिलियन डॉलर से अधिक का पूंजीगत व्यय होगा। लेकिन प्रारंभिक स्थिरता हस्तक्षेपों के बिना, भारत दशकों के लिए अक्षम, कार्बन-भारी इंफ्रास्ट्रक्चर में फंस सकता है।
न्याय (Nyaya) के दृष्टिकोण से यह प्रश्न उठता है: यह विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर किसकी सेवा करेगा? क्या यह केवल बेंगलुरु और मुंबई के टेक कॉरिडोर तक सीमित रहेगा, या बिहार के किसान और ओडिशा की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी इसका लाभ उठा पाएंगे? डेटा सेंटर की भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण है — तटीय क्षेत्र और हैदराबाद जैसे शहर पहले से ही नीतिगत प्रोत्साहनों, अपेक्षाकृत विश्वसनीय बिजली आपूर्ति और पानी तक बेहतर पहुंच के कारण हाइपरस्केलर्स को आकर्षित कर रहे हैं। लेकिन भूमि उपलब्धता, बिजली और पानी से जुड़ी दीर्घकालिक चिंताएँ अनसुलझी हैं। सेवा (Seva) का सिद्धांत हमें याद दिलाता है कि प्रौद्योगिकी का उद्देश्य सभी की सेवा होनी चाहिए, न कि केवल विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की। डेटा प्रोटेक्शन और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम ने भारत के डेटा सेंटर अर्थशास्त्र को नया आकार दिया है। डेटा स्थानीयकरण अब केवल एक चर्चा का विषय नहीं रहा; यह बाजार का चालक बन गया है। KPMG के विश्लेषण के अनुसार, डेटा संप्रभुता आज भारत में डेटा सेंटरों के विकास की तेजी का मुख्य कारण है।
बजट 2026 से पहले एक बार-बार आने वाली मांग है डेटा सेंटरों को आवश्यक राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में औपचारिक मान्यता — सड़कों, बंदरगाहों और हवाई अड्डों के समकक्ष। मेनन कहते हैं कि भारत की वृद्धि का अगला चरण इस बात पर निर्भर करता है कि क्या हम डेटा सेंटरों को राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में मान सकते हैं। डिलॉयट की बजट प्लेबुक के अनुसार, उद्योग क्षमता और हरित लक्ष्यों से जुड़ी कर छुट्टियां, पूंजीगत संपत्तियों पर सुगम GST इनपुट टैक्स क्रेडिट, AI इंफ्रास्ट्रक्चर आयात पर सीमा शुल्क राहत, और डीम्ड अप्रूवल के साथ वास्तव में समयबद्ध सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम की मांग कर रहे हैं। इस्पात, बिजली और नीति से परे, उद्योग एक और गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है: प्रतिभा। जबकि भारत AI कौशल प्रवेश में विश्व स्तर पर अग्रणी है, हाइपरस्केल, AI-रेडी डेटा सेंटर बनाने और संचालित करने में सक्षम अनुभवी पेशेवरों की कमी है।
डिलॉयट का अनुमान है कि वैश्विक AI अपनाने से अगले दशक में विश्व अर्थव्यवस्था में 17-26 ट्रिलियन डॉलर जुड़ सकते हैं, जिसमें भारत उस मूल्य का 10-15 प्रतिशत हासिल करने की स्थिति में है। सरैया कहते हैं कि जैसे-जैसे AI अपनाने में तेजी आएगी, भारत की डेटा सेंटर क्षमता आज के लगभग 1,450 MW से पांच वर्षों में 4,500 MW से अधिक हो सकती है। सवाल यह है कि क्या नीति उस पैमाने का समर्थन करने के लिए पर्याप्त तेजी से आगे बढ़ सकती है। सत्य (Satya) की कसौटी पर, हमें स्वीकार करना होगा कि सरकारी घोषणाएं और जमीनी हकीकत के बीच अक्सर अंतर होता है। जब तक यह अंतर नहीं पाटा जाता, भारत की AI महत्वाकांक्षाएं कागज पर भव्य और क्रियान्वयन में अधूरी रह सकती हैं। क्या बजट 2026 वह पुल बन सकता है जो वादों को वास्तविकता में बदले?
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