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₹1 लाख करोड़ का दांव: महाराष्ट्र में डेटा सेंटर पार्क और भारत की AI अवसंरचना की नई दिशा

₹1 लाख करोड़ का दांव: महाराष्ट्र में डेटा सेंटर पार्क और भारत की AI अवसंरचना की नई दिशा

मुंबई के उपनगरीय इलाके पालघर में, जहां कभी खेतों में धान की फसल लहराती थी, वहां अब एक नई कहानी लिखी जा रही है। लोधा डेवलपर्स ने घोषणा की है कि वे यहां ₹1 लाख करोड़ (लगभग $11 बिलियन) का निवेश करके 2.5 गीगावाट क्षमता का डेटा सेंटर पार्क बनाएंगे। यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी डेटा सेंटर परियोजनाओं में से एक होगी। दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान की गई इस घोषणा ने न केवल निवेशकों का ध्यान खींचा है, बल्कि यह सवाल भी उठाया है कि क्या भारत वास्तव में वैश्विक AI अवसंरचना की दौड़ में अपनी जगह बना पाएगा। एक किसान जो अभी भी अपने खेत से गुजरने वाली बिजली की तारों को देखता है और सोचता है कि क्या उसके गांव में भी कभी स्थिर बिजली आएगी, उसके लिए यह खबर एक विरोधाभास की तरह लगती है।

यह निवेश पहले की ₹30,000 करोड़ की प्रतिबद्धता के अतिरिक्त है, जो लोधा ने कुछ समय पहले महाराष्ट्र सरकार के साथ किया था। कुल मिलाकर, यह ₹1.3 लाख करोड़ से अधिक का निवेश होगा जो एक ही राज्य में, एक ही कंपनी द्वारा, एक ही क्षेत्र में किया जा रहा है। इस परियोजना का महत्व समझने के लिए कुछ संदर्भ जरूरी है। भारत में वर्तमान में कुल डेटा सेंटर क्षमता लगभग 1,000-1,200 मेगावाट है। लोधा की यह एक परियोजना अकेले 2,500 मेगावाट क्षमता की होगी, यानी मौजूदा राष्ट्रीय क्षमता से दोगुने से भी अधिक। IndiaAI मिशन के तहत सरकार ने 10,000 GPU की कम्प्यूट क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य रखा था, जिसे बाद में 34,000 GPU तक बढ़ाया गया। लेकिन वैश्विक AI दिग्गज जैसे OpenAI और Google प्रतिदिन लाखों GPU का उपयोग करते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, लोधा की परियोजना भारत की AI महत्वाकांक्षाओं को एक नया आयाम दे सकती है, बशर्ते यह समय पर और कुशलता से पूरी हो।

लेकिन 2.5 गीगावाट की बिजली आएगी कहां से? यह सवाल इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती है। महाराष्ट्र पहले से ही गर्मियों में बिजली की कमी से जूझता है। मुंबई जैसे शहर में भी पीक आवर्स में लोड शेडिंग होती है। ऐसे में एक डेटा सेंटर जो 2,500 मेगावाट बिजली की मांग करेगा, वह राज्य की ऊर्जा व्यवस्था पर कैसा बोझ डालेगा? सिस्को के मुख्य उत्पाद अधिकारी जीतू पटेल ने दावोस में एक दिलचस्प बात कही कि भविष्य में डेटा सेंटर अंतरिक्ष में बनाए जा सकते हैं, क्योंकि पृथ्वी पर बिजली की समस्या इतनी गंभीर हो जाएगी। यह कथन भले ही भविष्यवादी लगे, लेकिन यह वर्तमान चुनौतियों की गंभीरता को रेखांकित करता है। भारत में डेटा सेंटरों के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग अभी भी सीमित है। अधिकांश सुविधाएं कोयला-आधारित बिजली पर निर्भर हैं, जो कार्बन उत्सर्जन के मामले में चिंताजनक है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू है जिस पर ध्यान देना जरूरी है, वह है स्थानीय समुदायों पर प्रभाव। पालघर जिले के आदिवासी बहुल क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की जरूरत होगी। पिछले कुछ वर्षों में इसी क्षेत्र में बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर विवाद हुए हैं। क्या डेटा सेंटर परियोजना इन गलतियों से सीख लेगी? क्या स्थानीय लोगों को इस परियोजना में रोजगार मिलेगा, या वे केवल विस्थापन के शिकार बनेंगे? दूसरी ओर, महाराष्ट्र सरकार के लिए यह निवेश एक बड़ी सफलता है। दावोस में राज्य ने कुल $96 बिलियन के समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें यह डेटा सेंटर परियोजना सबसे बड़ी है। यह निवेश राज्य को AI और डिजिटल अर्थव्यवस्था का हब बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

न्याय (Nyaya) के दृष्टिकोण से देखें तो यह परियोजना कई सवाल खड़े करती है। क्या इस विशाल अवसंरचना का लाभ केवल बड़ी कंपनियों और शहरी उपभोक्ताओं को मिलेगा, या भारत के गांवों में बैठा किसान भी AI-संचालित कृषि सलाह और मौसम पूर्वानुमान का लाभ उठा पाएगा? संतोष (Santosha) यानी दीर्घकालिक स्थिरता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। 2.5 गीगावाट बिजली उत्पादन के लिए यदि जीवाश्म ईंधन का उपयोग हुआ, तो यह पर्यावरण पर क्या प्रभाव डालेगा? क्या लोधा और महाराष्ट्र सरकार ने इस परियोजना के लिए शत-प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा की प्रतिबद्धता की है? ये सवाल अनुत्तरित हैं। सत्य (Satya) की बात करें तो सरकारी घोषणाओं और वास्तविक निष्पादन के बीच अक्सर बड़ा अंतर होता है। भारत में कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं घोषणा के बाद वर्षों तक अधर में लटकी रहती हैं। क्या यह परियोजना अलग होगी?

PhonePe के IPO को SEBI की मंजूरी, राणा सेमीकंडक्टर्स को सिलिकॉन क्रिस्टल ग्रोथ उपकरण के लिए $3 मिलियन की फंडिंग, और AI-गाइडेड ट्रैफिक सिस्टम जो गणतंत्र दिवस 2026 पर दिल्ली में तैनात किया जाएगा, ये सभी खबरें बताती हैं कि भारत का तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से विकसित हो रहा है। लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब इन सभी टुकड़ों को एक साथ जोड़कर एक समावेशी डिजिटल भविष्य बनाना होगा। लोधा का डेटा सेंटर एक ईंट है इस इमारत की, लेकिन क्या यह इमारत सभी भारतीयों के लिए बनेगी, या केवल कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए? डिजिटल धर्म (Digital Dharma) हमें याद दिलाता है कि प्रौद्योगिकी का उद्देश्य सेवा है, न कि केवल लाभ। जब हम ₹1 लाख करोड़ के निवेश की बात करते हैं, तो हमें यह भी पूछना चाहिए कि इस निवेश का कितना हिस्सा वास्तव में आम भारतीयों के जीवन को बेहतर बनाएगा।

जब महाराष्ट्र के पालघर में यह विशाल डेटा सेंटर आकार लेगा, तो क्या वहां के आदिवासी युवा इसमें तकनीशियन के रूप में काम कर रहे होंगे, या वे अभी भी पास के शहरों में मजदूरी की तलाश में भटक रहे होंगे? क्या इस परियोजना की बिजली हरित स्रोतों से आएगी, या यह एक और कोयला-भूखी सुविधा होगी जो जलवायु संकट को और गहरा करेगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इस डेटा सेंटर में प्रोसेस होने वाला डेटा और AI मॉडल भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को समझेगा और सेवा करेगा, या यह केवल वैश्विक टेक दिग्गजों के लिए एक सस्ता गणना केंद्र बनकर रह जाएगा?

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